:
Breaking News

Business News: त्योहारी सीजन में महंगा हो सकता है खाद्य तेल, 10 फीसदी तक बढ़ने की आशंका

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | त्योहारी सीजन से पहले खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका, आयात लागत, कमजोर रुपया, माल ढुलाई और वैश्विक बाजार के दबाव से बढ़ सकता है घरेलू तेल का भाव।

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026 को Alam Ki Khabar की रिपोर्ट के अनुसार, देश में त्योहारी मौसम शुरू होने से पहले रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों को लेकर बाजार में एक बार फिर हलचल बढ़ गई है। उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक पितृपक्ष के बाद खाद्य तेल कंपनियां कीमतों में करीब 7 से 10 फीसदी तक बढ़ोतरी कर सकती हैं। हालांकि अंतिम बढ़ोतरी वैश्विक बाजार, आयात लागत और सरकार की आयात शुल्क नीति पर निर्भर करेगी। 

खाद्य तेल के दाम फिलहाल आयातित तेल की पर्याप्त उपलब्धता के कारण दबाव में हैं, लेकिन कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है। कच्चे खाद्य तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, कमजोर रुपया, समुद्री माल ढुलाई और बीमा खर्च में वृद्धि का असर भारतीय आयातकों, प्रोसेसर्स और रिफाइनर्स की लागत पर पड़ रहा है।

मार्च के बाद तीसरी बार बढ़ सकते हैं दाम

अगर त्योहारी सीजन में कंपनियां कीमत बढ़ाती हैं तो मार्च 2026 के बाद यह तीसरी बड़ी वृद्धि होगी। मार्च से जून के बीच खाद्य तेलों की कीमतों में दो चरणों में लगभग 5 से 6 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। इस अवधि में कुल वृद्धि करीब 10 से 12 फीसदी तक पहुंची थी।

अब दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार सामने हैं। इस दौरान घरों के अलावा मिठाई, नमकीन, होटल और खाद्य कारोबार में तेल की खपत बढ़ जाती है। मांग बढ़ने के साथ यदि आयात लागत भी ऊंची रहती है तो खुदरा बाजार में इसका असर दिखाई दे सकता है।

आयात पर निर्भरता से बढ़ता है घरेलू बाजार का जोखिम

भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। उपलब्ध बाजार आकलनों के मुताबिक देश की 58 फीसदी से अधिक खाद्य तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम, सोया और सूरजमुखी तेल की कीमतों में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर जल्दी दिखाई देता है। 

भारत में आने वाले कच्चे तेल की लागत केवल अंतरराष्ट्रीय भाव से तय नहीं होती। इसके साथ डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, जहाज का किराया, बीमा और बंदरगाह तक पहुंचने का खर्च भी जुड़ता है। इन सभी लागतों में बढ़ोतरी होने पर रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग कंपनियों का मार्जिन प्रभावित होता है।

कांडला में आयात लागत और बाजार भाव में अंतर

23 सितंबर के बाजार आकलन के अनुसार कांडला बंदरगाह पर पामोलिन की लैंडेड कॉस्ट करीब 1,494 रुपये प्रति 10 किलोग्राम बताई गई, जबकि स्पॉट कोटेशन लगभग 1,474 रुपये था। इसी तरह सोया-रिफाइंड की लैंडेड कॉस्ट करीब 1,517 रुपये और स्पॉट कोटेशन लगभग 1,415 रुपये बताया गया।

इस अंतर का मतलब है कि आयातित तेल को बाजार में बेचने पर कारोबारियों को लागत के मुकाबले कम कीमत मिल रही है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहने पर कंपनियों पर कीमतों में संशोधन का दबाव बढ़ सकता है।

कमजोर रुपये और महंगी ढुलाई ने बढ़ाई परेशानी

खाद्य तेल बाजार में इस समय केवल कच्चे तेल की कीमत ही चिंता का कारण नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हुआ है। इसके अलावा समुद्री परिवहन और बीमा लागत में बढ़ोतरी ने भी कुल आयात खर्च बढ़ाया है।

बाजार से जुड़े उद्योग प्रतिनिधियों के मुताबिक कच्चे खाद्य तेल की लैंडेड कॉस्ट में करीब 8 से 11 फीसदी तक वृद्धि हुई है। कंपनियों के सामने अब लागत को खुद वहन करने या उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का विकल्प है।

आयात शुल्क में कटौती हुई तो सीमित रह सकती है बढ़ोतरी

खाद्य तेल की कीमतों को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू सरकार की आयात शुल्क नीति है। बाजार में यह चर्चा है कि महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए सरकार खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती कर सकती है। हालिया बाजार रिपोर्टों में भी आयात शुल्क घटाने पर विचार की बात सामने आई है। 

अगर सरकार शुल्क में कमी करती है तो आयात की लागत घट सकती है और कंपनियों द्वारा प्रस्तावित मूल्य वृद्धि सीमित हो सकती है। इसी संभावना के चलते कुछ कारोबारी त्योहारी सीजन के लिए जरूरत से ज्यादा स्टॉक रखने से बच रहे हैं।

बंदरगाह पर माल, लेकिन खरीदार सतर्क

आयातकों ने त्योहारी मांग को ध्यान में रखते हुए पहले से खाद्य तेल की खेप मंगाई है। लेकिन घरेलू कारोबारियों की ओर से खरीदारी में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही है। कारोबारियों को आशंका है कि अगर आयात शुल्क कम हुआ तो आने वाले दिनों में बाजार भाव नीचे जा सकते हैं।

ऐसे माहौल में कई कारोबारी अपनी तत्काल जरूरत के मुताबिक ही माल खरीद रहे हैं। इसका असर आयातित तेल की बिक्री पर भी पड़ रहा है और कुछ मामलों में आयातकों को लागत से कम कीमत पर माल निकालना पड़ रहा है।

खाद्य तेल पर कितना आयात शुल्क?

कच्चे सोयाबीन तेल, कच्चे पाम तेल और कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क 10 फीसदी है। इसमें कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर यानी एआईडीसी को जोड़ने के बाद प्रभावी शुल्क करीब 16.5 फीसदी बताया जाता है।

वहीं रिफाइंड खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क 32.5 फीसदी है। एआईडीसी जोड़ने के बाद प्रभावी शुल्क करीब 35.75 फीसदी तक पहुंचता है।

आम परिवार के बजट पर क्या होगा असर?

यदि कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी करती हैं तो इसका सीधा असर घरेलू रसोई के बजट पर पड़ सकता है। त्योहारों के दौरान पकवान, मिठाई, नमकीन और तले हुए खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ने से तेल की मांग सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रहती है।

हालांकि खुदरा बाजार में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह अलग-अलग तेल की किस्म, ब्रांड, शहर, थोक बाजार और सरकार की आयात शुल्क नीति पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी से किसी निश्चित खुदरा कीमत का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

यह भी पढ़ें

बिहार में गैस की पर्याप्त उपलब्धता, सरकार ने अफवाहों पर लगाई रोक, 25 दिन बाद बुकिंग और समय पर डिलीवरी का भरोसा — 11 मार्च 2026 

बिहार की जीविका दीदियां अब बनाएंगी इंडक्शन चूल्हा: तकनीक, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान — 26 मार्च 2026 

देश में महंगाई का बढ़ता दबाव, खाद्य और ऊर्जा कीमतों ने बढ़ाई आम लोगों की चिंता — 6 जनवरी 2026 

रसोई के खर्च पर नजर रखने का समय

खाद्य तेल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी ऐसे समय में सामने आ रही है जब त्योहारी खरीदारी शुरू होने वाली है। तेल की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार से नहीं, बल्कि रुपये की विनिमय दर, आयात शुल्क, परिवहन और घरेलू मांग जैसे कई कारकों से प्रभावित होती है। इसलिए आने वाले दिनों में सरकार के आयात शुल्क संबंधी फैसले और अंतरराष्ट्रीय बाजार की चाल पर खाद्य तेल कारोबारियों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की भी नजर रहेगी।

संपादकीय: त्योहार से पहले रसोई के बजट की चुनौती

त्योहारी मौसम में खाद्य वस्तुओं की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। ऐसे समय में किसी भी जरूरी खाद्य सामग्री की कीमत में बदलाव सीधे परिवारों के मासिक बजट को प्रभावित कर सकता है। खाद्य तेल के मामले में आयात पर निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार और रुपये की चाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग ब्रांड और पैक की कीमतों की तुलना करना तथा जरूरत के अनुसार खरीदारी करना उपयोगी हो सकता है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *